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Global Voices हिन्दी में
रफ़्तार
चिट्ठाजगत

रविवार, 25 सितंबर 2011

वफ़ा का नक़ाब

ग़मों का ज़िन्दगी भर जो हिसाब रखता है,
उसे कभी न खुशी का सवाब मिलता है।

कटाना पड़ता है सर जान देनी पड़ती है,
किसी वतन में तभी इन्क़लाब आता है।

चराग़ों से तुम्हें गर मिलता है उजाला तो,
ज़लील चांदनी की क्यूं किताब पढता है।

उसे अजीज़ है गो बेवफ़ाई का बिस्तर ,
मगर पास वफ़ा का वो नक़ाब रखता है।

सिपाही,जान लुटाकर संवारते सरहद,
सियासी चाल से मौसम ख़राब होता है।

अंधेरों की भी ज़रूरत है सबको जीवन में,
हरेक दर्द कहां आफ़ताब हरता है।

शराब की क्या औक़ात, साक़ी की अदा से,
शराबियों को नशा-ए-शराब चढता है।

हवस के बिस्तर में रोज़ सोती है वो, सब्र
का मेरे दिल के बियाबां में ख़्वाब पलता है।

जो हार कर भी निरंतर प्रयास करता रहे,
वो दुनिया में सदा कामयाब होता है।

अगर तू इश्क़ समंदर से करता है दानी,
तो रोज़ साहिलों को क्यूं हिसाब देता है।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

धूप का टुकड़ा।

इक धूप का टुकड़ा भी मेरे पास नहीं है,
पर अहले जहां को कोई संत्रास नहीं है। ( अहले जहां - जहां वालों को )

मंझधार से लड़ने का मज़ा कुछ और है यारो,
मुरदार किनारों को ये अहसास नहीं है।

कल के लिये हम पैसा जमा कर रहे हैं ख़ूब,
कितनी बची है ज़िन्दगी ये आभास नहीं है।

मासूम चराग़ों की ज़मानत ले चुका हूं,
तूफ़ां की वक़ालत मुझे अब रास नहीं है।

मैं हुस्न के वादों की परीक्षा ले रहा हूं,
वो होगी कभी पास ये विश्वास नहीं है।

अब सब्र के दरिया में चलाऊंगा मैं कश्ती,
पहले कभी भी इसका गो अभ्यास नहीं है।

ग़ुरबत का बुढापा भी जवानी से कहां कम,
मेहनत की इबादत का कोई फ़ांस नहीं है।

आज़ादी का हम जश्न मनाने खड़े हैं आज,
बेकार ,सियासी कोई अवकाश नहीं है।

अब भूख से मरना मेरी मजबूरी है दानी,
हक़ में मेरे रमज़ान का उपवास नहीं है।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

हम दोनों गर साथ ।

हम दोनों गर साथ ज़माने को क्या,
दिन हो या रात, ज़माने को क्या।

आज चराग़ों और हवाओं की गर,
निकली है बारात, ज़माने को क्या।

बरसों हुस्न की मज़दूरी कर मैंने,
पाई है ख़ैरात ,ज़माने को क्या।

साहिल से डरने वाले गर लहरों,
को देते हैं मात, ज़माने को क्या।

कोई हुस्न कोई जाम की बाहों में,
जिसकी जो औक़ात ज़माने को क्या।

मैं ग़रीबी में भी ख़ुश रहता हूं,ये
है ख़ुदाई सौग़ात, ज़माने को क्या।

ग़ैरों से बांह छुड़ाये ठीक ,अगर
अपने करें आघात, ज़माने को क्या।

शाम ढले घर आ जाया करो बेटे,
ये समय है आपात ज़माने को क्या।

चांद वफ़ा का शौक़ रखे दानी पर,
चांदनी है बदज़ात ज़माने को क्या।