क्या भरोसा ज़िदगी का
वक़्त की नाराज़गी का।
इश्क़ के बादल भटकते
दे पता अपनी गली का।
हुस्न की लहरों से बचना
ये समंदर है बदी का।
फूलों को समझाना आसां
ना-समझ है दिल कली का।
आंधी सी वो आई घर में
थम चुका है कांटा घड़ी का।
दौड़ने से क्या मिलेगा
ये सफ़र है तश्नगी का।
बन्धनों से मुक्त है जो
मैं किनारा उस नदी का।
चांद के सर पे है बैठी
क्या मज़ा है चांदनी का।
ग़म खड़ा है मेरे दर पे
क्या ठिकाना अब ख़ुशी का।
बेच खाया दानी का घर
ये सिला है दोस्ती का।
वक़्त की नाराज़गी का लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
वक़्त की नाराज़गी का लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बुधवार, 1 दिसंबर 2010
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


