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शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

अब हमर जात पात के राचर हा चरमरावत जावत हवय, चरवाहा बिन,गाय गरुवा एती ओती भागत जावत हवय, पूना अउ बंगलोर के हवा पानी मा नइ जानन का्य हवय, लैका मन किसम किसम के खिचड़ी पकावत जावत हवय, अउ उंखर खुशी के कारण उंखर दाई ददा मन घलो ऐसनेच, उत्ता धुर्रा खिचड़ी ला बने चांट चांट के खावत जावत हवय्। पर एखर एक सकरात्मक पक्ष हे,जेन समाजवाद ला नेता, मन नइ ला सकिन, ओला लैका मन लावत जावत हवय।

अब हमर जात पात के राचर हा चरमरावत जावत हवय, चरवाहा बिन,गाय गरुवा एती ओती भागत जावत हवय, पूना अउ बंगलोर के हवा पानी मा नइ जानन का्य हवय, लैका मन किसम किसम के खिचड़ी पकावत जावत हवय, अउ उंखर खुशी के कारण उंखर दाई ददा मन घलो ऐसनेच, उत्ता धुर्रा खिचड़ी ला बने चांट चांट के खावत जावत हवय्। पर एखर एक सकरात्मक पक्ष हे,जेन समाजवाद ला नेता, मन नइ ला सकिन, ओला लैका मन लावत जावत हवय।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

नया हूं अभी

मैं तेरे शह्र में बिलकुल नया नया हूं अभी,
तेरे वादों के हवालात में बंधा हूं अभी।

चराग़ों के लिये मंज़ूर है मुझे मरना,
मुकद्दर आंधियों के तेग पर रखा हूं अभी।

घिरी है बदज़नी से , हुस्न की गली गोया,
लुटाने इश्क़ के इमान को चला हूं अभी।

बहुत डरता हूं उजालों की बेख़ुदी से मैं,
तेरी यादों के अंधेरों में जा छिपा हूं अभी।

ख़ुदा के गांव से आया हुआ मुसाफ़िर हूं,
तुम्हारे हुस्न के चौपाल पर फ़िदा हूं अभी।

मुहब्बत में वफ़ा के बदले धोखा ही पाया,
मगर फिर भी वफ़ा का ज़ुल्म कर रहा हूं अभी।

समंदर से मेरा रिश्ता पुराना है दानी,
सितमगर साहिलों से डरने लगा हूं अभी।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

क़ातिल लापता है

मौत से ये दिल रज़ा है,
और क़ातिल लापता है।

वो समंदर ,मैं किनारा,
उम्र भर का फ़ासला है।

मैं चरागों का मुहाफ़िज़,
वो हवाओं की ख़ुदा है।

सब्र की जंज़ीरें मुझको,
खुद हवस में मुब्तिला है।

सांसें कब की थम चुकी हैं,
ज़ख्मे दिल फिर भी हरा है।

बेवफ़ाई की ज़मीं पर,
शजरे दिल अब भी खड़ा है।

चैन भी वो ले गई है,
जिसको दिल मंने दिया है।

बोझ सांसों का उठाये,
इक ज़माना हो गया है।

प्यार की सरहद पे दानी,
इश्क़ ही क्यूं हारता है।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

वादों की कश्ती

वादों की कश्ती पर सवार है दिल,
हिज्र के ज़ुल्मों का शिकार है दिल्।

तुमसे मिल के करार पाऊंगा,
बस यही सोच बेकरार है दिल्।

तुमको देकर किनारों की खुशियां,
एक समंदर सा बेहिसार है दिल्।

तू थी तो बिन पिये नशा सा था,
तू गई जब से बेखुमार है दिल्।

तेरे खातिर बना के ताजमहल,
एक दरवेश का मज़ार है दिल्।

तू हवस के सफ़र की एक राही,
मंज़िले सब्र का ग़ुबार है दिल्।

तेरी ज़ुल्फ़ों के सर्द साये में,
एक भड़कता हुआ शरार है दिल्।

बेवफ़ाई की लह्रें भी मंज़ूर,
गो वफ़ा की तटों का यार है दिल्।

आज कल यूं ही दानी हंसता है,
वरना सदियों से अश्कबार है दिल