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Global Voices हिन्दी में
रफ़्तार
चिट्ठाजगत

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

इश्क़ का मंदिर

ख़ुदगरज़ तेरी मुहब्बत की हवा है,
रोज़ जिसको छत बदलने में मज़ा है।

सैकड़ों मशगूल हैं सजदे में तेरे,
तू जवानी के बियाबां की ख़ुदा है।

मैं पुजारी ,इश्क़ के मंदिर का तेरा,
देवी दर्शन पर मुझे मिल ना सका है।

आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।

दिल के भीतर सैकड़ों दीवारें हैं अब,
रिश्तों का बाज़ार पैसों पर टिका है।

है ज़रूरी पैसा जीने के लिये पर,
इश्क़ का गुल्लक भरोसों से भरा है।

तुम भी तडफ़ोगी वफ़ा पाने किसी की,
एक हुस्ने-बेवफ़ा को बद्दुआ है।

सच्चा आशिक़ सब्र के सागर में रहता,
तू किनारों के हवस में मुब्तिला है।

आगे राहे-इश्क़ में बढना तभी ,गर
दानी कुरबानी का दिल में हौसला है।

1 टिप्पणी:

  1. डा.संजय दानी जी
    आदाब अर्ज़ है हुज़ूर !
    क्या ख़ूब लिखते हैं जनाब ! क़ुर्बान हूं …

    सैकड़ों मशगूल हैं सजदे में तेरे,
    तू जवानी के बियाबां की ख़ुदा है

    सदके आपकी रूमानियत के …

    आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
    सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है

    "ओये होए ! "
    हर शे'र की ता'रीफ़ में अल्फ़ाज़ कम पड़ जाएंगे , इसलिए कम कहे को ज़्यादा मानें …

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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