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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

दिल का गागर

भुरभुरा है दिल का गागर,
क्यूं रखेगा कोई सर पर।

हिज्र का दीया जलाऊं,
वस्ल के तूफ़ां से लड़ कर।

उनकी आंखों के साग़र,
ग़म बढाते हैं छलक कर।

जब से तुमको देखा है सनम,
थम गया है दिल का लश्कर।

भंवरों का घर मत उजाड़ो,
फूल, बन जायेंगे पत्थर।

झूठ का आकाश बेशक,
जल्द ढह जाता है ज़मीं पर।

ग़म, किनारों का मुहाफ़िज़
सुख का सागर दिल के भीतर।

न्याय क़ातिल की गिरह में,
फ़ांसी पे मक़्तूल का सर।

आशिक़ी मांगे फ़कीरी,
दानी भी भटकेगा दर-दर।

8 टिप्‍पणियां:

  1. ग़म, किनारों का मुहाफ़िज़
    सुख का सागर दिल के भीतर।

    बढ़िया !

    उत्तर देंहटाएं
  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं
  4. अनुपमा जी , वाणी जी ,संगीता स्वरूप ( गीत) जी , वंदना जी व कैलाश शर्मा जी का शत शत आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आप सबको नववर्ष की शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. ग़म, किनारों का मुहाफ़िज़
    सुख का सागर दिल के भीतर।
    संजय जी कुछ कहूँगी तो शब्द कम पड जायेंगे। दूसरी बात अभी इतनी नायाब गज़ल कहने तक नही पहुँच पाई इस लिये सिर्फ लाजवाब ही कह सकती हूँ। सच मे आप बहुत अच्छी गज़लें लिखते है।

    उत्तर देंहटाएं