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शनिवार, 30 जुलाई 2011

मौत की उम्मीद

मरने की उम्मीद में बस जी रहा हूं,
अपनी सांसों का कफ़न खुद सी रहा हूं।

तेरी आंखों के पियाले देखे जब से,
मैं शराबी तो नहीं पर पी रहा हूं।

जनता के आइनों से मैं ख़ौफ़ खाता ,
मैं सियासी चेहरों का पानी रहा हूं।

तुम तवायफ़ की गली की आंधियां, मैं,
बे-मुरव्वत शौक की बस्ती रहा हूं।

क्या पता इंसानियत का दर्द मुझको,
सोच से ता-उम्र सरकारी रहा हूं।

काम हो तो मैं गधे को बाप कहता,
दिल से इक चालाक व्यापारी रहा हूं।

इश्क़ में तेरे ,हुआ बरबाद ये दिल,
हुस्न के मंचों की कठपुतली रहा हूं।

जग, पुजारी है किनारों की हवस का,
सब्र के दरिया की मैं कश्ती रहा हूं।

मत करो दानी हवाओं की ग़ुलामी,
मैं चरागों के लिये ख़ब्ती रहा हूं।

6 टिप्‍पणियां:

  1. भिक्षाटन करता फिरे, परहित चर्चाकार |
    इक रचना पाई इधर, धन्य हुआ आभार ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. तेरी आंखों के पियाले देखे जब से,
    मैं शराबी तो नहीं पर पी रहा हूं।
    achha prayas ,... shubhkamnayen ../

    उत्तर देंहटाएं
  3. डा. संजय भईया... बेहतरीन ग़ज़ल को पढ़ के आनंद आ गया...
    सादर..

    उत्तर देंहटाएं