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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

बे-वफ़ाई

अब बेवफ़ाई, इश्क़ का दस्तूर है , राहे-मुहब्बत दर्द से भरपूर है।
बारिश का मौसम रुख़ पे आया इस तरह,ज़ुल्फ़ों का तेरा दरिया भी मग़रूर है।
ग़म के चमन को रोज़ सजदे करता हूं ,पतझड़ के व्होठों में मेरा ही नूर है।
इस झोपड़ी की यादों में इक ख़ुशबू है ,महलों के रिश्ते भी सनम नासूर हैं।
दिल के समन्दर में वफ़ा की कश्ती है , आंख़ों के साग़र को हवस मन्जूर है।
जब से नदी के पास ये दिल बैठा है , मेरी रगों की प्यास मुझसे दूर है।
चालें सियासत की, तेरे वादों सी , जनता उलझने को सदा मजबूर है।
ग़म के चराग़ो को जला कर बैठा हूं , अब आंधियों का हुस्न बे-नूर है।
दिल राम को तरज़ीह देता है मगर , मन रावणी क्रित्यों में मख़मूर है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. दिल राम को तरज़ीह देता है मगर , मन रावणी क्रित्यों में मख़मूर है। क्या खूब कहा है

    उत्तर देंहटाएं
  2. बारिश का मौसम रुख़ पे आया इस तरह,ज़ुल्फ़ों का तेरा दरिया भी मग़रूर है।

    wah bhai bahut khoob likha hai
    badhai

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब आंधियों का हुस्न बे-नूर है
    वाह! मज़ा आ गया डॉक़टर साहब आप के कलाम में !
    वाह-वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  4. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

    उत्तर देंहटाएं
  5. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

    मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

    यदि कोई सहायता चाहिए तो खुलकर पूछें यहाँ सभी आपकी सहायता के लिए तैयार हैं.

    शुभकामनाएं !


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    उत्तर देंहटाएं
  6. वाईस आफ़ पिपुल,रत्नाकर जी,हिमान्शु मोहन जी, अजय कुमार जी,व इ-गुरू राजीव को बहुत बहुत धन्यवाद मेरे ब्लाग में विसिट करने हेतू और इस नाचीज़ की हौसला अफ़्जाई के लिये। कुछ नकरात्मक बात, मेरी किसी रचना में आपको महसूस हो तो बेधड़क मुझे guide करे आख़िर मैं भी आपके बिरादरी की इक नयी कलम हूं

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. धन्यवाद संगीता पुरी जी आप जैसे लोगों की टिप्पणियां मिलती रहेगीं तो शायद मैं अपने लय को बनाये रख पाऊंगा।

    उत्तर देंहटाएं
  9. " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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